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सन १९०७ की बात है| ४३ वर्ष के लियो बैकलैंड ने फिनॉल और फॉर्मल डीहाइड नामक रसायनों पर प्रयोग करते करते एक नए पदार्थ की खोज कर डाली| उन्होंने दुनिया का पहला कम लागत का कृत्रिम रेसिन बनाया था जो आगे चलकर विश्व भर के बाजार में सफलतापूर्वक अपनी जगह बनाने वाला प्लास्टिक बन गया | इसके अविष्कारक के नाम पर ही इसका नाम बैकलाइट रखा गया |

इस कहानी को और भी अच्छे से समझने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं |लियो बैकलैंड जो की बेल्जियम के नागरिक थे की कहानी भी प्रेरणादायक है | वो एक गरीब परिवार से थे | उनके पिताजी एक मोची थे और उनकी माँ आस पास के घरों में काम करती थी | लियो के माँ ने उन्हें नाईट स्कूल में पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया और आगे चल उन्हें घेंट यूनिवर्सिटी में २० साल की उम्र में पीएचडी करने के लिए छात्रवृति मिली |

बीसवीं सदी के पहले ३० सालो में बैकलाइट प्लास्टिक पूरी दुनिया में मशहूर हो गया था जिसने लियो के लिए धन और समृद्धि के द्वार खोल दिए | जब सन् १९२४ में मशहूर टाइम मैगज़ीन के पहले पृष्ठ  पर लियो  की तस्वीर छपी, तब उसके नीचे सिर्फ यह लिखा था –  ” ये न जलेगा , न पिघलेगा” | प्लास्टिक आधुनिक दुनिया के विकास और लोगो की दैनिक जिंदगी का  एक अहम् हिस्सा बन गया |

सन १९११ मेंलेखिका सुज्जैन फ्रैंकल ने अपनी पुस्तक में यह बात की थी की हम अपनी दैनिक जीवन में रोजाना कितनी वस्तुओ का सामना करते हैं| उनके सर्वे में यह उजागर हुआ की हम रोजाना औसतन १९६ ऐसी वस्तुओं का इस्तेमाल करते हैं जो प्लास्टिक की बनी  होती हैं.  इसकी तुलना में केवल १०२ ऐसी वस्तुओं का प्रयोग हम रोज़ करते हैं जो प्लास्टिक की बनी  हुई नहीं होती | यानि हमअपने जीवन में औसतन दो-तिहाई ऐसी वस्तुओ का इस्तेमाल करता है जो प्लास्टिक की होती हैं| बिजली के स्विच और बाल्टी से लेकर टूथब्रश और मोबाइल फोन तक सभी प्लास्टिक से बने होते हैं | पूरी दुनिया में इतना प्लास्टिक बन रहा है की इसको बनाने में विश्वभर के ८ प्रतिशत तेल का इस्तेमाल होता है|

प्रकृति ने हमें धातु लकड़ी और अनेक  खनिज पदार्थ जैसी सामग्री की आपूर्ति की है, लेकिन प्लास्टिक वह पहला पदार्थ है जिसे पूर्णतया मनुष्य ने अपनी ज़रुरत के  कृत्रिम रूप से बनाया है | यह सत्य है कि प्लास्टिक एक सुविधाजनक वस्तु है – सस्ता है और किसी भी आकार में ढाला जा सकता है और इससे बनी हुई ज्यादातर वस्तुए बिजली और उष्मा के अच्छे सुचालक नहीं होते हैं|

मगर प्लास्टिक में बहुत बड़ी खामी है. प्रकृति जो देती है वह उसे वापिस लेना भी भली भांति जानती है. मगर १०० फीसदी कृत्रिम है, और इसे प्राकृतिक रूप से पचाने में बहुत समय लगता है. प्लास्टिक की बनी हुई वस्तुएं कचरे के ढेर में भी घुलने में १,००० वर्ष से अधिक समय लेती हैं | जहाँ प्लास्टिक की बोतलें ४५० वर्ष का समय लेती हैं वही पॉलिथीन बैग विगठित होने १० से १०० साल का वक़्त लेते हैं | एक और चिंताजनक विषय यह है की जब प्लास्टिक पानी में अल्ट्रावायलेट किरणों के संपर्क में आता  हैं तब यह और भी छोटे कणो में बदल सकते है| इन्हे सूक्ष्म पार्टिकुलेट प्लास्टिक या माइक्रो प्लास्टिक भी कहा जाता है | ये छोटे कण बैक्टीरिया द्वारा खाये जा सकते हैं और बड़ी ही आसानी से हमारी भोजन श्रृंखला में प्रवेश कर सकते हैं | यही कारण है की एक आम इंसान हर हफ्ते ५ ग्राम  प्लास्टिक का सेवन कर रहा है जो की एक क्रेडिट कार्ड के वजन के बराबर है|

पूरी दुनिया की तरह भारत भी प्लास्टिक के कचरे की बढ़ती  मात्रा की परेशानी से जूझ रहा है | भारत प्रतिदिन २६,००० टन प्लास्टिक का कचरा उत्पन्न करता है | वैसे इसमें चार महानगरों शहरो का सबसे बड़ा हिस्सा है | देश के मुख्य ६० शहरों से जो भी  प्लास्टिक का कचरा उत्पन्न होता है उसका ४०% हिस्सा केवल इन चार शहरों का होता है | औसतन एक भारतीय प्रतिवर्ष ११ किलो प्लास्टिक का इस्तेमाल करता है जो की अमेरिका के एक व्यक्ति के १०९ किलो प्लास्टिक  प्रति वर्ष के उपभोग से काफी कम है |

यहां हमें इस बात पर भी गौर करना होगा की भारत में प्रति दिन १०,००० टन प्लास्टिक का कचरा नहीं उठाया जाता | और यही वह कचरा है जो हमारी नदियों और नालो में बह जाता है या फिर भूमि पर कचरे के पहाड़ बन जाता है |एक रिपोर्ट के अनुसार २०५० तक हमारी समुद्रों में इतना प्लास्टिक होगा जो की उस पानी में रह रही मछलियों के वजन से भी कही ज्यादा होगा |

हम एक चौराहे पर हैं|

एक और जहाँ  प्लास्टिक हमारे विकास में अहम् बन चुका, है वहीं दूसरी ओर , ये हमारे पर्यावरण के लिए खतरा बनता जा रहा है | हाल ही में भारत सरकार ने एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगाना शुरू किया है,  जिसमें प्लास्टिक के बने झोले, कप, प्लेट और छोटी बोतलें तक शामिल हैं | लोग का इसका समर्थन करते नज़र आ रहे हैं |

प्लास्टिक पर प्रतिबन्ध आगामी नीति होने जा रही है. लेकिन प्लास्टिक के विकल्पों को खोजने के लिए भी आवश्यकता है | प्लास्टिक का हर तरफ प्रयोग होता है और इस लिए इसका कचरा अक्सर प्रत्यक्ष दिखता है.   लेकिन ये भी सोचना चाहिए की प्लास्टिक नहीं तो क्या ? इसका जवाब भी हमें ही देना होगा |

डेनमार्क की पर्यावरण एवं भोजन मंत्रालय  की २०१८ की एक रिपोर्ट के अनुसार यह माना गया की प्लास्टिक के विकल्पों को पर्यावरण के अनुकूल  मानने  की धारणा बनाना भी एक गलती होगी | कागज़ और कपडे के थैले भी पर्यावरण पर भारी पड़ते हैं – उन्हें बनाने में भी लकड़ी, पानी, शुद्ध हवा का इस्तेमाल होता है और इनके उत्पाद से भी जल का अम्लीकरणऔर वातावरण का प्रदूषण होता है | इस रिपोर्ट के निष्कर्ष में यही बताया गया है कि, यदि एक प्लास्टिक के थैले के मुकाबले बराबर वातावरण का प्रभाव सीमित करना है तो एक कागज़ का थैला ४३ बार और के कपडे का थैला ७,१०० बार इस्तेमाल किया  जाना पड़ेगा | क्या हम इसके लिए तैयार हैं ?

ऐसे सभी विकल्पो के प्रभाव को देखना होगा और ये भी जानना होगा की ऐसे विकल्प जितने प्रभावशाली हैं | अन्यथा एक दशक बाद, हम इन्ही विकल्पों पर चर्चा करेंगे – की कागज़ के थैलों की वजह  से भारी मात्रा में जंगल काटे जा रहे हैं या  कपडे के थैलो की वजह से पानी में रासायनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ते जा रही है|

क्या विज्ञान के द्वारा इसका हल ढूढ़ना एक पहल हो सकती है ?

जून २०१६ में जापानी वैज्ञानिको ने एक सूक्ष्म जीवाणु “आडिओनेला सकइएनसीस”  की खोज की जो प्लास्टिक को प्राकृतिक रूप से हजम करने  में सक्षम है. यह प्लास्टिक तो खा जाता है और ऊर्जा बनाता है | यह बैक्टीरिया  “PETase” एंजाइम बनाता है जो की PET प्लास्टिक को पचाने में सक्षम है, जिसका इस्तेमाल बोतल, कप और बहुत सी बिजली से जुड़ी प्लास्टिक वस्तुओ के कचरे को समाप्त करने के लिए  किया जा सकता है |

२०१८ में ही अमेरिका में वैज्ञानिको की एक टीम ने भी एक ऐसा ही एंजाइम कृत्रिम रूप से अपनी प्रयोगशाला में बनाया | इससे यह साबित होता है हम उस राह पर चल चुके हैं जहा सैकड़ो वर्ष से जमे हुए प्लास्टिक को हफ्तों में खत्म किया  जा सकता है|

हमारे रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक की बहुत सी ऐसी वस्तुए हैं जिन्हे पुनः उपयोग में लाया जा सकता है | लेकिन इस प्रक्रिया में सबसे बड़ा रोड़ा यह है की इस कचरे की रीसाइक्लिंग के लिए छटनी कैसे करी जाए ?  यहाँ तक की प्लास्टिक की बोतल और उसके ऊपर चिपकाए हुए प्लास्टिक, और उसके ढक्कन को भी अलग-अलग श्रेणी में रखा जाना आवश्यक है | मशीनों का इस्तेमाल करके प्लास्टिक की छंटनी करना बहुत ही मुश्किल कार्य है. ऐसी  मशीनों में चुम्बक से काम नहीं कर सकती होते है. प्लास्टिक की ५० से भी अधिक अलग अलग श्रेणियां हैं जिनका घनत्व आस-पास होता है | यही वजह है की सेंट्रीफ्यूज करने से भी यह अलग नहीं हो पाते | इसलिए इनकी छटनी मानव द्वारा ही की जाता सकती है|

लेकिन अब यह आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (A )की वजह से बदल रहा है | जैसे ही क्लार्क़े नमक एक रोबोट जो AI   से चलता है , वह प्लास्टिक की दूध की थैली और बोतल से लेकर अन्य छोटी वस्तुओ में अंतर समझने में कुशल है और एक वस्तु प्रति सेकंड की दर से वस्तुओ को छांटता है|

दुनिया भर में प्लास्टिक का इस्तेमाल करके घर और सड़क बनायीं जा रही हैं | ईको -ब्रिक इस्तेमाल किए हुए प्लास्टिक की बॉटलों से बनते हैं जिसका इस्तेमाल फर्नीचर और दीवार बनाने के लिए किया जा सकता है|  उसी प्रकार से प्लास्टिक का इस्तेमाल रोड बनाने के लिए किआ जा सकता है- भारत सरकार ने भी १,००,००० किलोमीटर की सड़क के लिए प्लास्टिक का उपयोग करने का आवाहन किया  है|

इसके अलावा प्लास्टिक को ईंधन और प्लास्टकी तेल के उत्पाद के लिए भी किया जा सकता है |  इंग्लैंड की एक कंपनी ने  प्लास्टिक का इस्तेमाल करके प्लाक्स  नामक तेल बनाया है| प्रति ७,००० टन प्लास्टिक कूड़े का इस्तेमाल करके ५,२०० टन प्लाक्स तेल का उत्पाद किया जा सकता है| प्लाक्स का इस्तेमाल पेट्रोकेमिकल कंपनियों  से लेकर जहाज के इंजन के ईंधन के तौर पर भी किया जा सकता है| प्लाक्स बनाए वाली कंपनी का कहना है की प्लाक्स तेल बनाने वाली मशीन ३ साल में अपनी लागत वसूल करने की क्षमता रखती हैं|

आने वाले कुछ समय में यदि प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगेगा तो न सिर्फ  प्लास्टिक उद्योग, बल्कि समग्र औद्योगिक क्षेत्र को एक बड़ी चुनौती का सामना करना होगा क्यूंकि सभी प्लास्टिक से किसी न किसी प्रकार से सम्बद्ध हैं | एक ओर जहाँ प्लास्टिक से होने वाले पर्यावरणीय नुक्सान को ध्यान में रखना होगा वही दूसरी ओर प्लास्टिक के पुनरुपयोगऔर उनके प्रतिस्थापन के लिए एक दीर्घकालिक नीति की आवश्यकता है|

As published in Amar Ujjala on September 22, 2019.

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